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Jan 13, 2010

मृग तृष्णा

ढूँढता क्यों अपनी ख़ुशी, खुद से दूर जाकर
फिर लगा गले ज़िन्दगी, पास आकर

सब वही, सब वैसा हैं, जैसा छोड़ा जस
कुछ मुसाफिर, और साथ क्या यही गम बस

छोड़ हठ, स्वीकार सच,
देख बाँहे, खुली हैं सब

धिक्कार दे, घटनाओं को, सीख उनसे कुछ
पर मत बदल इंसान को, अपना उन्हें फिर भी

Jan 26, 2008

इक्षा और प्रसन्नता

मेरी प्रसन्नता मेरे स्वीकार करने के समानुपाती और मेरी इक्षाओं के विपरीत अनुपात मैं हैं
जितनी मेरी इक्षाएं, उतना मेरा दुख
जितना मैं करूं स्वीकार, उतना मेरा सुख

Jan 12, 2008

आधुनिक सिद्धांत और सांस्कृतिक विचारधाराएँ

मैं कभी यह सोचता हूँ कि इतनी समृद्ध संस्कृति होने के पश्चात भी ऐसी कई नयी विचारधाराएँ हैं जिनका हमारे अपने इतिहास एवं मिथक मैं कही भी उल्लेख नही हैं। जैसे आंग्ल भाषा का एक शब्द हैं assert. क्या आप बता सकते हैं कि इसका हिन्दी शब्द क्या हो सकता हैं।

Dec 23, 2007

न हो ऐसा कभी

चाहता हूँ की कभी ऐसा न होता
धारणाएं जो अपनी उप्योगीता खो बैठी
आ बैठी हैं भविष्य के द्वार पर
बन बैठी दरबान।
जात,पंथ,भूगोल
भाषा,बोली
इंसान को इंसान से क्यों बाटती हैं।
भय भविष्य का क्यों घर कर जाता हैं
बदला समय, बदली दिशा
हर कुछ जो हो रह, वह भिन्न हैं
पर आवश्यक नही कि वह गलत ही हो
क्या मानवता के अगले पचास वर्ष होंगे वैसे ही
जैसे बीते हैं पिछले पचास
यदि नही तो क्यो वही मापदंड अपनाए जाये,
जो हो गए हैं बस दंड।

परन्तू सत्य केवल इतना नही
क्यो भविष्य नही देखता बीते समय के प्रेम को
उसके भय को, क्यो नही दिलाता विश्वास,
अपने कर्म से, अपने आचरण से
कि यदि भूत कि कुछ धारणाएं गलत हैं तो कुछ सही भी
क्यों नही देता सम्मान उन धरनायों के पीछे छुपी भावनाओ को
क्यों नही देता सम्मान, उन परम्परों को जो हमें जोड़ती हैं हमारे स्वर्णिम इतिहास से
जोड़ती हैं जो हमें उस ज़मीं से, जिसका ऋण चुकाना अभी हैं बाक़ी
जो धर्म हैं हमारा।
क्या हैं परमपरा जो जोड़ती हैं, क्या हैं परंपरा जो बाटती हैं,

क्या दो परम्पराएँ जुड़ नही सकती
हो सकता हैं शायद एक नयी परंपरा कि शुरुरत

मूँद लेते हैं हम अपनी आखें।
नही बनाया हैं भगवान् ने हमें ईर्ष्या के लिए
दी बस दो शिक्षा
प्रेम और क्षमा
और नही दीया अधिकार हमें